स्वावलंबी आत्मनिर्भर जीवन!
जंगल जाना, लकड़ी काटना, पानी भरना, यही हमारे जीवन का रोज का क्रम था। चल चरखा, कारोपानी से जुड़ने के बाद स्वयं हथकरघा सीखकर गांव की अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देती हूँ। बहुत अच्छा लगता हैं ये सोचकर की हम दूसरो के जीवन को भी सहारा दें पा रहे हैं। ऐसा अच्छा जीवन देने के लिए आचार्य श्री के चरणों में बारम्बार नमोस्तु।
-प्रमोद सूरजे

















